Tuesday, December 9, 2008

आदरणीया'भारती' जी ,
आपका रचना संसार निश्चित रूप से अनुपम है।
मैंने आपकी अद्यतन रचनाएँ ' ज़मीर ' ,'तोहफा' और 'बाबुल की बेटी 'पढ़ीं।
लगा कि मैं ज़िन्दगी की वास्तविकता को अपनी हथेली पर रखकर साक्षात्कार कर रहा हूँ ।
आपकी रचनाएँ काव्य प्रेमियों के लिए चिरकाल तक प्रेरणादायी बनी रहेंगी ।
मैं आपको व आपके रचना संसार को नमन करता हूँ !
आपके द्वारा प्रेषित 'वाणी वंदना 'पर प्रोत्साहन स्वरुप टिपण्णी के रूप में शुभकामनाएँ प्राप्त हुईं जिनके लिए आपको कोटिशः धन्यवाद!
निश्चित ही आपकी प्रेरणाएं हमारा संबल होंगी।
कृपया हमारी साईट देखकर हमें अनुगृहीत करती रहें।

December 9, 2008 8:54 ऍम

आदरणीया'शमा' जी ,
आपका रचना संसार निश्चित रूप से अनुपम है।
मैंने आपकी अद्यतन रचनाएँ ' एक,दोऔर तीन 'पढ़ीं।
लगा कि मैं ज़िन्दगी की सच्चाई से साक्षात्कार कर रहा हूँ और आज के युग में सत्पथ पर चलने की प्रेरणा दुर्लभ है तिस पर अंतस की गहराई से उद्भूत भाव काव्य का रूप लें क्या कहना !बधाई !
आपकी रचनाएँ काव्य प्रेमियों के लिए चिरकाल तक प्रेरणादायी बनी रहेंगी ।
मैं आपको व आपके रचना संसार को नमन करता हूँ !
आपके द्वारा प्रेषित 'वाणी वंदना 'पर प्रोत्साहन स्वरुप टिपण्णी के रूप में
शुभकामनाएँ प्राप्त हुईं जिनके लिए बेटीकोटिशः धन्यवाद!
निश्चित ही वास्तविकता प्रेरणाएं हमारा संबल होंगी।
कृपया हमारी साईट देखकर हमें अनुगृहीत करती रहें।

December 9, 2008 9:19 AM

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Tuesday, December 2, 2008

वाणी वंदना




वाणी वंदना



सत् कर्म जीवन में पले
अम्लानपथ मानव चले
भवभाव को विस्तार दे
हे अम्ब शारदे सार दे

सम-भाव के सूरज तले
वैषम्यका हिमनग गले
तू शिवम् का उपहार दे
हे अम्ब शारदे सार दे

सत्य का दीपक जले
अनय की संध्या टले
पंक जलनिधि तार दे
हे अम्बशारदे सार दे

हिंस्रभीहों मानव भले
विद्रूपता करतल मले
चारित्र्य का संसार दे
हे अम्ब शारदे सार दे

परपीर कंटक सी खले
कटुता घटे समता पले
ममतामयी तू प्यार दे
हे अम्ब शारदे तार दे

Monday, December 1, 2008

स्वातंत्र्य पर्व



स्वातंत्र्य पर्व

आभा (मुक्तिबोध साहित्य सरणी पाथाखेडा जिला बेतुल मध्यप्रदेश ) में प्रकाशित (अगस्त 1998)

निज स्वतंत्र राष्ट्र का हमने
स्वर्ण जयंती वर्ष मनाया ,
आह्वान है चिंतन करने का
हमने स्वातंत्र्य कैसे पाया

क्या खोया क्या पाया हमने
अर्द्ध शताब्दी पूर्ण हुई , औ'
लेखाजोखा देखें
यदि हम तो
पाएँगे हमसे कुछ चूक हुई

क्या मूल्य चुका पाये उनका
कुछजिनका हमें चुकाना था,
गलीं पीढियाँ थीं बस
जिसके
हित
उसको ही अपनाना था

अर्पित करने को शीश धरा
पर , वीर जो आगे आए थे ,
प्राणों की आहुति दे-दे कर
उन गीत क्रांति के गाये थे

माँ के सपूत ही लाज रखें
हम सबकी माँ बहनों की,
है जिनके अंतस में बसती
भारतमाँ की पावन झाँकी

प्रत्यूष पर्व नक्षत्र बने जो
है उनकी ही पहचान रही,
जो देश धरा के लिए जिए
उन्हीं का जीवन रहा सही


आओ हम गुण-गान करें
आजादी के दीवानों का,
तनमनधन अर्पित करने
वाले उन वीरजवानों का।

सन्यासी विद्रोह हुआ जो
वो भारतमाँ का था उद्धार,
वीर प्रसविनी वसुंधरा का
था अर्चन -वंदन -श्रृंगार।

देश- भक्ति का ज्वार उठा
था भारत के जनसागर में ,
जागरण
हुआ नर-नारी में
ग्रामीण और हर नागर में।

चेतना लहर सब में दौड़ी
विद्रोहअग्नि थी फूट पड़ी,
अंत फिरंगी का करने को
भारतकी जनता टूट पड़ी।

वीर सपूत मंगल पाण्डेय ने
आजादी-बिगुल बजाया था ,
एकत्र हुए सब क्रांतिवीर औ'
स्वतंत्रतानल भड़काया था।

युद्ध पताका थाम हाथ में
की झाँसी ने अगुआई थी ,
मुक्ति-वाहिनी नाना की

जो रानीकी अनुयायीथी।

वीर शिरोमणि तात्या ने
कर में करवाल उठाई थी ,
सबने मिलकर एक साथ
अंग्रेजोंको धूल चटाई थी।

खेत रहे झाँसी हित पूरन
वीरांगना झलकारी बाई ,
राधा-भाऊ वीर गौस खां
औ'खुदाबख्श मोती बाई।

लड़े अंत तक रानीके संग
रघुनाथ कुँअर मुन्दरबाई,
जूही सागरसिंह कुँअर से
थे काशी और सुंदर बाई।

झाँसीने बलिदान दिया जो
भूल न कोई पाया था औ',
क्रांतिज्वाल फैली जन-गण
मेंभगवांध्वज लहराया था।

उन वीरों का नाम अमर है
जिनने था बलिदान दिया,
और उन्हीं का नाम अमर
जिन गोरों को झुका दिया।

भारत के जन जन ने फिर
से वंदे मातरम गाया था ,
स्वतंत्रता अधिकार हमारा
नारा तिलक लगाया था।

महर्षि दयानंद से सन्यासी
स्वातंत्र्य यज्ञ में कूद पड़े ,
औ'यती विवेकानंद सरीखे
पूर्णाहुति को निकल पड़े।

गोखले वीर सावरकर से थे
अरविन्द घोष वारींद्र घोष ,
अनुयायी शतशत क्रांतिवीर
सरदार भगत औ'खुदीबोस।

गाँधी सुभाष असफाक
सभी
जन बिस्मिल बटुकेश्वर जैसे,
थे राजगुरु मन्मथ से नायक
अरु आज़ाद चन्द्रशेखर तैसे।

लालपाल से अनुयायीथे
बाल तिलक गंगाधर के,
जिधर चले योद्धा अनेक
थेसुखदेव ऊधमसिंह से।

जागरण मंच देते युग को
कुछ ऐसे प्रखर मेधावी थे,
सक्रिय मनीषी मालवीय
विद्यार्थी बहुत प्रभावीथे।

बालकृष्ण शर्मा नवीन की
कलम उगलती आग सदा,
अज्ञेय नाम युगक्रांति रहा
कला क्रांति से नहीं जुदा ।

नेहरू पटेल बाबा साहेब
औ' देशबंधु से लायर थे,
जो राष्ट्रदीपके शलभ बने
वे माखन जैसे शायर थे।

कुछ तो भारत माँ के सपूत
जो रचते थे इतिहास नया,
स्वतंत्रता है जिनकी काशी
औ'काबा मथुरा बोध गया।

सर्वस्व लुटाया देश धरा पर
था जिनका स्वर्णिम सपना,
पायेगा स्वातंत्र्य विभा जब
बलिदान फलेगा तब अपना।

क्या साध पूर्ण कर पाये हम

उनकी जो थे बलिदानी वीर
किया कलंकित है उनको ही
जो रहे विवेकी नीर -क्षीर ।

यद्यपि खोजे हैं विविध क्षेत्र
उन्नति के मिल कर हमने ,
है विज्ञान तकनीकी में भी
पायी सफलता हम सबने ।

आत्मनिर्भरता अनाजकी
पायी,अन्तरिक्ष पहचाना,
कर्षण यंत्रों के साथ साथ
परमाणु अस्त्र संधाना ।

हुए नये अन्वेषण जग में
पीछे नहीं किसी से हम ,
पर पिछड़ गए शिक्षा में
जिसका है हमको गम ।

कहीं कहीं पर बढ़ी भुखमरी
कहिं घोर गरीबी का आलम,
राष्ट्रचरित का हनन कहीं औ'
कहिं सम्प्रदायवाद-मातम।

कहीं बढ़ा उन्माद धर्म का
द्वेष- भाव जिससे बढ़ता ,
भाषावाद व क्षेत्रवाद का
ज़हर सदा रहता चढ़ता ।

मुक्ति पा सकें यदि इनसे
तो राष्ट्र हमारा सोना है ,
विकासशील से विकसित
होंअन्यथा हमेशा रोना है।


बाँटने वालो



बाँटने वालो


बाँटने वालो !
सीमाएँ बाँटकर
कहाँ जाओगे ?

बाँटने वालो !
दिलों को बाँटकर
क्या पाओगे ?

बाँटने वालो !
मातम तवाही बाँटकर
कौन सुख पाओगे ?

यदि बाँट सकते हो
तो बाँटो सौहार्द्र
यदि बाँट सकते हो
तो बाँटो दिलों में प्यार

यदि बाँट पाओ
तो बाँटो मुरझाये
चेहरों को मुस्कान /
बुझे चेहरों को ज्योति

धरा स्वर्ग कहलाये



धरा स्वर्ग कहलाये


पीड़ा तो जीवन अंतस का
रहीसदा
मानसका चिंतन
यदि ये उर क्रंदन बन जाए
तो ये धरा स्वर्ग कहलाये

पर पीड़ा अपनी हो पाये
परमारथकर जग सरसाये
अक्षि नीर मोती बन जाए
तो ये धरा स्वर्ग कहलाये।

रक्त पिपासा अघ अभिलाषा
पलती रही सदा जिस उर में
उसमें यदि करुणा भर जाए
तो ये धरा स्वर्ग कहलाये ।

पर पीड़ा भी बनकर संवेदन
मम पीड़ा
सा अंतस सरसाये
हर संवेदन उर में बस जाए
तो ये धरा स्वर्ग कहलाये


पीड़ा का आभाव खलता है
मानव में दानव पलता है
यदि मानव-मानवहो पाये
तो ये धरा स्वर्ग कहलाये ।

पीड़ा मस्तक चंदन हो पाये
तब मानव- मानव कहलाये
विद्वेष- मुक्त समता जाये
तो ये धरा स्वर्ग कहलाये ।

सबके हित औ'सबके सुखमें
यदि अपना जीवन रंग जाये
सारी जगती अपनी हो पाये
तो ये धरा स्वर्ग कहलाये

उनकी माँ रोती है

उनकी माँ रोती है

मारुति संस्कृति भी
क्या चीज है !
इधर मारुति में पेट्रोलभर लेते हैं
पर उधर रोती माँ को
एक गिलास पानी भी नहीं
बड़ी अदा से स्टीरिंग के पास
बैठ जाते हैं पाँव लटकाकर
उधर रोती माँ को छोड़कर

चल पड़ते हैं सवार हो ,
कहा जाता है कि स्टीरिंग
के पास एक सुंदर सीट है
पर सीट नहीं कुछ और है ;
यहीं थोडी सी जगह है जो खाली है
कहने को तो जगह है पर;
जगह नहीं वो कब्र है और जो सीट है
वो सीट नहीं कब्र कि कगर है

आदमी कगर पर बैठा है
कब्र में पाँव लटकाए
आगे बढ़ता है मौत की ओर
बेपरवाह और एकाएक होता है कि
कब्र छटपटाती
लटके पाँव अपनी ओर खींच लेने को

असावधान होता या
अलसाता है जैसे ही चालक
होनी-अनहोनी होती भयानक
औ' मौत के आगोश में होता अचानक
माँ पाती है संदेश
अपने लाल का
बिलखकर कहती है कि
कैसा ये बहाना काल का
रुदन करती छटपटाती
और फिर यों चीखती है
क्या यही नियति है कि
जो
मारुति लेते हैं
उनकी माँ रोती है