Monday, December 1, 2008

उनकी माँ रोती है

उनकी माँ रोती है

मारुति संस्कृति भी
क्या चीज है !
इधर मारुति में पेट्रोलभर लेते हैं
पर उधर रोती माँ को
एक गिलास पानी भी नहीं
बड़ी अदा से स्टीरिंग के पास
बैठ जाते हैं पाँव लटकाकर
उधर रोती माँ को छोड़कर

चल पड़ते हैं सवार हो ,
कहा जाता है कि स्टीरिंग
के पास एक सुंदर सीट है
पर सीट नहीं कुछ और है ;
यहीं थोडी सी जगह है जो खाली है
कहने को तो जगह है पर;
जगह नहीं वो कब्र है और जो सीट है
वो सीट नहीं कब्र कि कगर है

आदमी कगर पर बैठा है
कब्र में पाँव लटकाए
आगे बढ़ता है मौत की ओर
बेपरवाह और एकाएक होता है कि
कब्र छटपटाती
लटके पाँव अपनी ओर खींच लेने को

असावधान होता या
अलसाता है जैसे ही चालक
होनी-अनहोनी होती भयानक
औ' मौत के आगोश में होता अचानक
माँ पाती है संदेश
अपने लाल का
बिलखकर कहती है कि
कैसा ये बहाना काल का
रुदन करती छटपटाती
और फिर यों चीखती है
क्या यही नियति है कि
जो
मारुति लेते हैं
उनकी माँ रोती है





1 comment:

संत शर्मा said...

Aapki is kavita ka auchitya samajh nahi paya, kripa ho yadi aap kuch praksh dale.