Tuesday, December 9, 2008

आदरणीया'भारती' जी ,
आपका रचना संसार निश्चित रूप से अनुपम है।
मैंने आपकी अद्यतन रचनाएँ ' ज़मीर ' ,'तोहफा' और 'बाबुल की बेटी 'पढ़ीं।
लगा कि मैं ज़िन्दगी की वास्तविकता को अपनी हथेली पर रखकर साक्षात्कार कर रहा हूँ ।
आपकी रचनाएँ काव्य प्रेमियों के लिए चिरकाल तक प्रेरणादायी बनी रहेंगी ।
मैं आपको व आपके रचना संसार को नमन करता हूँ !
आपके द्वारा प्रेषित 'वाणी वंदना 'पर प्रोत्साहन स्वरुप टिपण्णी के रूप में शुभकामनाएँ प्राप्त हुईं जिनके लिए आपको कोटिशः धन्यवाद!
निश्चित ही आपकी प्रेरणाएं हमारा संबल होंगी।
कृपया हमारी साईट देखकर हमें अनुगृहीत करती रहें।

December 9, 2008 8:54 ऍम

आदरणीया'शमा' जी ,
आपका रचना संसार निश्चित रूप से अनुपम है।
मैंने आपकी अद्यतन रचनाएँ ' एक,दोऔर तीन 'पढ़ीं।
लगा कि मैं ज़िन्दगी की सच्चाई से साक्षात्कार कर रहा हूँ और आज के युग में सत्पथ पर चलने की प्रेरणा दुर्लभ है तिस पर अंतस की गहराई से उद्भूत भाव काव्य का रूप लें क्या कहना !बधाई !
आपकी रचनाएँ काव्य प्रेमियों के लिए चिरकाल तक प्रेरणादायी बनी रहेंगी ।
मैं आपको व आपके रचना संसार को नमन करता हूँ !
आपके द्वारा प्रेषित 'वाणी वंदना 'पर प्रोत्साहन स्वरुप टिपण्णी के रूप में
शुभकामनाएँ प्राप्त हुईं जिनके लिए बेटीकोटिशः धन्यवाद!
निश्चित ही वास्तविकता प्रेरणाएं हमारा संबल होंगी।
कृपया हमारी साईट देखकर हमें अनुगृहीत करती रहें।

December 9, 2008 9:19 AM

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Tuesday, December 2, 2008

वाणी वंदना




वाणी वंदना



सत् कर्म जीवन में पले
अम्लानपथ मानव चले
भवभाव को विस्तार दे
हे अम्ब शारदे सार दे

सम-भाव के सूरज तले
वैषम्यका हिमनग गले
तू शिवम् का उपहार दे
हे अम्ब शारदे सार दे

सत्य का दीपक जले
अनय की संध्या टले
पंक जलनिधि तार दे
हे अम्बशारदे सार दे

हिंस्रभीहों मानव भले
विद्रूपता करतल मले
चारित्र्य का संसार दे
हे अम्ब शारदे सार दे

परपीर कंटक सी खले
कटुता घटे समता पले
ममतामयी तू प्यार दे
हे अम्ब शारदे तार दे

Monday, December 1, 2008

स्वातंत्र्य पर्व



स्वातंत्र्य पर्व

आभा (मुक्तिबोध साहित्य सरणी पाथाखेडा जिला बेतुल मध्यप्रदेश ) में प्रकाशित (अगस्त 1998)

निज स्वतंत्र राष्ट्र का हमने
स्वर्ण जयंती वर्ष मनाया ,
आह्वान है चिंतन करने का
हमने स्वातंत्र्य कैसे पाया

क्या खोया क्या पाया हमने
अर्द्ध शताब्दी पूर्ण हुई , औ'
लेखाजोखा देखें
यदि हम तो
पाएँगे हमसे कुछ चूक हुई

क्या मूल्य चुका पाये उनका
कुछजिनका हमें चुकाना था,
गलीं पीढियाँ थीं बस
जिसके
हित
उसको ही अपनाना था

अर्पित करने को शीश धरा
पर , वीर जो आगे आए थे ,
प्राणों की आहुति दे-दे कर
उन गीत क्रांति के गाये थे

माँ के सपूत ही लाज रखें
हम सबकी माँ बहनों की,
है जिनके अंतस में बसती
भारतमाँ की पावन झाँकी

प्रत्यूष पर्व नक्षत्र बने जो
है उनकी ही पहचान रही,
जो देश धरा के लिए जिए
उन्हीं का जीवन रहा सही


आओ हम गुण-गान करें
आजादी के दीवानों का,
तनमनधन अर्पित करने
वाले उन वीरजवानों का।

सन्यासी विद्रोह हुआ जो
वो भारतमाँ का था उद्धार,
वीर प्रसविनी वसुंधरा का
था अर्चन -वंदन -श्रृंगार।

देश- भक्ति का ज्वार उठा
था भारत के जनसागर में ,
जागरण
हुआ नर-नारी में
ग्रामीण और हर नागर में।

चेतना लहर सब में दौड़ी
विद्रोहअग्नि थी फूट पड़ी,
अंत फिरंगी का करने को
भारतकी जनता टूट पड़ी।

वीर सपूत मंगल पाण्डेय ने
आजादी-बिगुल बजाया था ,
एकत्र हुए सब क्रांतिवीर औ'
स्वतंत्रतानल भड़काया था।

युद्ध पताका थाम हाथ में
की झाँसी ने अगुआई थी ,
मुक्ति-वाहिनी नाना की

जो रानीकी अनुयायीथी।

वीर शिरोमणि तात्या ने
कर में करवाल उठाई थी ,
सबने मिलकर एक साथ
अंग्रेजोंको धूल चटाई थी।

खेत रहे झाँसी हित पूरन
वीरांगना झलकारी बाई ,
राधा-भाऊ वीर गौस खां
औ'खुदाबख्श मोती बाई।

लड़े अंत तक रानीके संग
रघुनाथ कुँअर मुन्दरबाई,
जूही सागरसिंह कुँअर से
थे काशी और सुंदर बाई।

झाँसीने बलिदान दिया जो
भूल न कोई पाया था औ',
क्रांतिज्वाल फैली जन-गण
मेंभगवांध्वज लहराया था।

उन वीरों का नाम अमर है
जिनने था बलिदान दिया,
और उन्हीं का नाम अमर
जिन गोरों को झुका दिया।

भारत के जन जन ने फिर
से वंदे मातरम गाया था ,
स्वतंत्रता अधिकार हमारा
नारा तिलक लगाया था।

महर्षि दयानंद से सन्यासी
स्वातंत्र्य यज्ञ में कूद पड़े ,
औ'यती विवेकानंद सरीखे
पूर्णाहुति को निकल पड़े।

गोखले वीर सावरकर से थे
अरविन्द घोष वारींद्र घोष ,
अनुयायी शतशत क्रांतिवीर
सरदार भगत औ'खुदीबोस।

गाँधी सुभाष असफाक
सभी
जन बिस्मिल बटुकेश्वर जैसे,
थे राजगुरु मन्मथ से नायक
अरु आज़ाद चन्द्रशेखर तैसे।

लालपाल से अनुयायीथे
बाल तिलक गंगाधर के,
जिधर चले योद्धा अनेक
थेसुखदेव ऊधमसिंह से।

जागरण मंच देते युग को
कुछ ऐसे प्रखर मेधावी थे,
सक्रिय मनीषी मालवीय
विद्यार्थी बहुत प्रभावीथे।

बालकृष्ण शर्मा नवीन की
कलम उगलती आग सदा,
अज्ञेय नाम युगक्रांति रहा
कला क्रांति से नहीं जुदा ।

नेहरू पटेल बाबा साहेब
औ' देशबंधु से लायर थे,
जो राष्ट्रदीपके शलभ बने
वे माखन जैसे शायर थे।

कुछ तो भारत माँ के सपूत
जो रचते थे इतिहास नया,
स्वतंत्रता है जिनकी काशी
औ'काबा मथुरा बोध गया।

सर्वस्व लुटाया देश धरा पर
था जिनका स्वर्णिम सपना,
पायेगा स्वातंत्र्य विभा जब
बलिदान फलेगा तब अपना।

क्या साध पूर्ण कर पाये हम

उनकी जो थे बलिदानी वीर
किया कलंकित है उनको ही
जो रहे विवेकी नीर -क्षीर ।

यद्यपि खोजे हैं विविध क्षेत्र
उन्नति के मिल कर हमने ,
है विज्ञान तकनीकी में भी
पायी सफलता हम सबने ।

आत्मनिर्भरता अनाजकी
पायी,अन्तरिक्ष पहचाना,
कर्षण यंत्रों के साथ साथ
परमाणु अस्त्र संधाना ।

हुए नये अन्वेषण जग में
पीछे नहीं किसी से हम ,
पर पिछड़ गए शिक्षा में
जिसका है हमको गम ।

कहीं कहीं पर बढ़ी भुखमरी
कहिं घोर गरीबी का आलम,
राष्ट्रचरित का हनन कहीं औ'
कहिं सम्प्रदायवाद-मातम।

कहीं बढ़ा उन्माद धर्म का
द्वेष- भाव जिससे बढ़ता ,
भाषावाद व क्षेत्रवाद का
ज़हर सदा रहता चढ़ता ।

मुक्ति पा सकें यदि इनसे
तो राष्ट्र हमारा सोना है ,
विकासशील से विकसित
होंअन्यथा हमेशा रोना है।


बाँटने वालो



बाँटने वालो


बाँटने वालो !
सीमाएँ बाँटकर
कहाँ जाओगे ?

बाँटने वालो !
दिलों को बाँटकर
क्या पाओगे ?

बाँटने वालो !
मातम तवाही बाँटकर
कौन सुख पाओगे ?

यदि बाँट सकते हो
तो बाँटो सौहार्द्र
यदि बाँट सकते हो
तो बाँटो दिलों में प्यार

यदि बाँट पाओ
तो बाँटो मुरझाये
चेहरों को मुस्कान /
बुझे चेहरों को ज्योति

धरा स्वर्ग कहलाये



धरा स्वर्ग कहलाये


पीड़ा तो जीवन अंतस का
रहीसदा
मानसका चिंतन
यदि ये उर क्रंदन बन जाए
तो ये धरा स्वर्ग कहलाये

पर पीड़ा अपनी हो पाये
परमारथकर जग सरसाये
अक्षि नीर मोती बन जाए
तो ये धरा स्वर्ग कहलाये।

रक्त पिपासा अघ अभिलाषा
पलती रही सदा जिस उर में
उसमें यदि करुणा भर जाए
तो ये धरा स्वर्ग कहलाये ।

पर पीड़ा भी बनकर संवेदन
मम पीड़ा
सा अंतस सरसाये
हर संवेदन उर में बस जाए
तो ये धरा स्वर्ग कहलाये


पीड़ा का आभाव खलता है
मानव में दानव पलता है
यदि मानव-मानवहो पाये
तो ये धरा स्वर्ग कहलाये ।

पीड़ा मस्तक चंदन हो पाये
तब मानव- मानव कहलाये
विद्वेष- मुक्त समता जाये
तो ये धरा स्वर्ग कहलाये ।

सबके हित औ'सबके सुखमें
यदि अपना जीवन रंग जाये
सारी जगती अपनी हो पाये
तो ये धरा स्वर्ग कहलाये

उनकी माँ रोती है

उनकी माँ रोती है

मारुति संस्कृति भी
क्या चीज है !
इधर मारुति में पेट्रोलभर लेते हैं
पर उधर रोती माँ को
एक गिलास पानी भी नहीं
बड़ी अदा से स्टीरिंग के पास
बैठ जाते हैं पाँव लटकाकर
उधर रोती माँ को छोड़कर

चल पड़ते हैं सवार हो ,
कहा जाता है कि स्टीरिंग
के पास एक सुंदर सीट है
पर सीट नहीं कुछ और है ;
यहीं थोडी सी जगह है जो खाली है
कहने को तो जगह है पर;
जगह नहीं वो कब्र है और जो सीट है
वो सीट नहीं कब्र कि कगर है

आदमी कगर पर बैठा है
कब्र में पाँव लटकाए
आगे बढ़ता है मौत की ओर
बेपरवाह और एकाएक होता है कि
कब्र छटपटाती
लटके पाँव अपनी ओर खींच लेने को

असावधान होता या
अलसाता है जैसे ही चालक
होनी-अनहोनी होती भयानक
औ' मौत के आगोश में होता अचानक
माँ पाती है संदेश
अपने लाल का
बिलखकर कहती है कि
कैसा ये बहाना काल का
रुदन करती छटपटाती
और फिर यों चीखती है
क्या यही नियति है कि
जो
मारुति लेते हैं
उनकी माँ रोती है





Saturday, November 29, 2008

समझौता



समझौता


सब
कुछ ठीक ठाक होने के बाद
उधर से एक नाग चला
और इधर से बिल
जो नाग चला वो नाग नहीं
किसी महापुरुष का आदेश है
जो चला जा रहा है बिल की ओर
बिल बढ़ा रहा है नाग की ओर
अर्थात ;
आदेश चला जा रहा है
बिल की ओर और
बिल चला रहा है
आदेश की ओर


वैसे तो बिल की प्रकृति है
कि धरती से जुड़ा रहे पर ;
आज उसने इसका
अतिक्रमण कर दिया है

और धरती से उखड़कर
उस ओर चल दिया है
जिस ओर नाग

दोनों मिलते हैं परस्पर
नाग बिल में प्रवेश
करने का प्रयास करता है
बिल वर्जना करता है
रोक देता है तुरन्त
कहता है ठहरो

हम दोनों के मध्य
एक समझौता हुआ है
क्या भूल गए ?
यह समझौता केवल
समझौता ही नहीं
बल्कि ;
साक्ष्य है निराकार
परमात्मा-सा जो
हमारे बीच समाया हुआ है
क्या भूल गए

जब तक यह पूर्ण नहीं होगा
तब तक तुम मेरा
स्पर्श तक नहीं कर सकते
अर्थात
मुझमें प्रवेश नहीं कर सकते

कौन-सा समझौता ?
क्या स्मरण नहीं दिलाओगे ?
बिल तपाक से बोल पड़ा
इतना भी नहीं जानते
तुम मुझसे पहले चले थे
थोड़ा सा पहले ;
इसलिए अवस्था में बड़े हो
तुम्हारे बाद मैंने
यात्रा शुरू की थी
इसलिए मैं छोटा हूँ
दोनों एक साथ चले होते
तो बराबर के होते अर्थात
होते हम फिफ्टी-फिफ्टी के

पर तुम जितने कुछ बड़े हो
उतना ही कुछ मैं छोटा हूँ
इसलिए फिफ्टी-फिफ्टी का नहीं
समझौता है सिक्सटी -फोर्टी का
याद आया !
यही
समझौता जो
कभी हमारे बीच हुआ था
और आज भी है

मुझे अटल विश्वास है
की आगे भी रहेगा
यही हमारे सहअस्तित्व का रक्षक है
और
व्याप्त है पत्रावलियों में
निराकार परमात्मा- सा
यदि तुम चले होते
तो मैं नहीं होता और अब
मैं साथ दूँ तो तुम्हारा
अस्तित्व ही मिट जाएगा।

इसलिए
हम और तुम ,
तुम और हम
परस्पर पूरक बने
और मिलकर आगे बढ़ें
दोनों मिल सिक्सटी -फोर्टी का
हिसाब लेते रहें- देते रहें

सारनी

सारनी

सुंदर-
सुरम्य- धरा
अंचल हरीतिमा
का
जो तप्त जन मानस

को
शीतल फुहार दे

नगरी अनूप अतुल
श्रेणी
सतपुड़ा मध्य
म्लानमन मानवको
अम्लान
करि कारदे

अंक जो करंक धारे
जिसे प्रकृति श्रृंगारे
मन तू कलुष त्याग
मानव को प्यार दे

नगरी कोलविद्युत की
सहचरी सहभाग की
जहाँ सहकर्मियों का
श्रम- संबल बहार दे

श्रम के सपूत जो हैं
शिष्य विश्वकर्मा के
इनका श्रम महायज्ञ
दैन्य को नकार दे

नगरी सौदामिनी की
नगर को उजियार दे
आजीविकाधार जो
जन-जीवन संवार दे

नगर-वन-पर्वत-डगर में
ज्ञान का आलोक छिटके
मानव विनय-नत सदा
हो अपनत्व
का संसारदे

उत्तुंग गिरिशिखर पर
विराजते
हैं मठार देव
शिवमहिमा अपार जो
पल में पतित तार दे

श्लेष है सारनी में सार ले औ' सार दे
सारहीन अर्थों को सारदे विसार दे ,
कि -
सारहीन कर्मों को सार देवि सार दे




Friday, November 28, 2008

नगाड़ा

नगाड़ा
एक ज़माने में
नारी को
किसी अभद्र ने
अबला कह दिया था
वास्तव में शक्तिपुंज है जो;
वह नारी
अबला नहीं हो सकती
जो अबला समझ
अपमानित करना चाहते हैं
वास्तव में
वे भीषण विपदा को गले लगाते हैं

ऐसा अपमान चुनौती है नारी का
जिसका सामना करने को तत्पर हो
आज की नारी !
जो कभी देवी कहलाती थी
आज भी देवी है और
जो कभी सबला कहलाती थी
आज भी सबला है

यदि तेरी अस्मिता पर किसी ने
प्रश्नचिह्न लगाया और
तेरी गरिमा को कलुषित बनाया
तो तू जाग और
स्वत्व की पहचान कर ले
निज शक्ति का अहसास भर ले

फिर निज प्राण-त्राण हित
पदात्रण को
शास्त्रवत तू हस्तगत कर
कूच कर तू उस दिशा में
जिधर से आवाज आयी
खोज कर उस कटु वदन की
जिसने थी जिह्वा चलायी

लगा उस आवाज से था -
फुसकार विषधर ने लगायी
साथ ही
यों जीभ उसने लपलपायी
चाहता था हड़प जाना
जो तेरी पहचान को
चाहता था चाट जाना तव
अस्मिता -अभिमान को

बैठना तुझको नहीं है हारकर
शास्त्र थामे हाथ में तू वारकर
अन्यथा अवसर को पाकर
वही चेहरा सामने फिर आयेगा
और विषाक्त जीभ
फिर लापलापायेगा

क्या सह सकेगी यह
शायद नहीं !
तो अनुकूल अवसर है यही '
कदम यदि आगे बढाया
जीत तेरी है सुनिश्चित
अदम्य साहस पा सकेगी
जो आज नारी जाति चिंतित

चोट कर निज शस्त्र से उस शक्ल पर
बदल दे तू शक्ल उसकी /अक्ल उसकी
शस्त्र का प्रहार
शक्ल सह सकेगी
अन्यथा क्या ठिकाने
अक्ल उसकी रह सकेगी

शस्त्र -शक्ल संघात
जब होगा बराबर
शक्ति तेरी को तभी
पहचान पायेगा चराचर
चोट देखेगा जहां यों
शक्ल पर होती ठनाठन
ज्यों चोब पड़ती हो
नगाडे पर दनादन

लोग देखेंगे कहेंगे
पिट रहा ये क्यों धमाधम
कुछ कहेंगे नर नहीं ये तो
निपट निकला नराधम
कुछ कहेंगे क्षोभ से
पिटता विचारा
कुछ कहेंगे रोब से
बजता
नगाड़ा

संतुष्ट इतने से अगर तो
तुरत पीछे लौट आना
अन्यथा तत्काल अपना
कदम तू आगे बढ़ाना
पाँव में तू पहन ले
जो शस्त्र थामा हाथ में
करवाल कर में थामकर
दे बलि चढा इक साथ में।

जब सिद्ध कर देगी कि
तू तो शक्ति का आगार है
नम जायेगा नर लोक तब
जिसका पिशाची आधार है
शस्त्र जब कोई सँभाले
त्राण दुनिया मागती है
शक्ति से ही भक्ति एवं
प्रीति भय से जागती है
संघर्ष अभी भी शेष है/
संघर्ष अभी विशेष है
नहिं हारना हिम्मत कहीं
तू दिखा दे अधम नर को
शक्ति हूँ अबला नहीं ।











संक्रमण

संक्रमण
प्रतिनिधि कविताएँ संक्रमण अलोक प्रेस भोपाल (1999)

अतीत
वक्ष
वर्तमान वृक्ष
सत्य वृंत
हरा जीवंत
अहिंसा डाल
प्रेमपत्र झाल
भविष्यफल मानवता

पादप
नीड़
चाहतगिद्ध भीड़
पाश्चात्य ढंग
लज्जित अनंग
नूतन खोज
शाश्वतमूल्य भोज
आस्था खंडन
वासना मंडन

चरित्र
पहेली
कुंठा सहेली
सदी संक्रमण
आहत श्रमण
डूबता विश्वास
इक्कीसवीं हतास






Thursday, November 27, 2008

मुक्तिदूत

मुक्तिदूत
आभा (मुक्तिबोध साहित्य सरणी पाथाखेडा जिला बेतुल मध्यप्रदेश ) में प्रकाशित (दिसम्बर 1997)
हे साधक !
पारस को खोजते हैं लोग
अकिंचन धातु सोना बनने के लिए
पर;
तुमने तो जो भी पत्थर छुआ
वही पारस बन गया
कहीं ऐसा तो नहीं कि -
तुम्हारे अहर्निश का श्रम हो
ये पारस

हे पथिक !
पथ को खोजते हैं लोग
निर्बाध यात्रा के लिए
पर तुम जिधर से निकले
वहीं पथ बन गया
कहीं ऐसा तो नहीं कि -
तुम्हारे संघर्षों का सुफल हो
ये पथ

हे माधव !
मधुवन को खोजते हैं लोग
श्रांति मिटने के लिए
पर;
तुम तो जहाँ भी रमे
वहीं मधुवन हो गया
कहीं ऐसा तो नहीं कि -
तुम्हारे मधु /तुम्हारे प्यार का
सुंदर उपहार हो
ये मधुवन

हे मनीषी !
मनीषा के चंचल हाथों में
रिक्त साहित्य दीप
थमा देते हैं लोग
अंधकार में भटकाव के लिए
पर;
तुमने तो हर दीप को
स्नेह पूरित किया है /
नई ज्योति दी है
कहीं ऐसा तो नहीं कि -
ये स्नेह /ये तेल
तुम्हारे अंतस की पीड़ा हो
जिसने मानव के निकट ला दिया है
ये साहित्य

तुम साधक हो /पथिक हो
माधव हो /मनीषी हो और
हो असीम व्यक्तित्व !
ये पारस /ये पथ
ये मधुवन /ये साहित्य क्या हैं?
ये हैं तुम्हारे व्यक्तित्व से
छिटके ओज -बिन्दु और
मानवता के आधार
इनसे हम पायें नया बोध
नई दिशा /नया शोध क्योंकि
इन्हीं में समाया है मुक्तिबोध


वीर जवान

वीर जवान
देश भक्ति से बड़ा जगत में
कोई धर्म नहीं -2
भारत माँ की रक्षा जैसा
कोई कर्म नहीं -2
जंग कारगिल लड़ने वाले
दुश्मन पर भारी पड़ने वाले
वो कौन हैं -
भारत के वीर जवान-

अभियान
विजय पर जाने वाले
दुश्मन को मार भगाने वाले
वो कौन हैं -
भारत के वीर जवान -

देशप्रेम
से बढ़कर दूजा
कोई प्रेम नहीं -2
मातृभूमि के प्रेम सरीखा
कोई प्रेम नहीं -
माँ का मान बढ़ाने वाले
मस्तक पुष्प चढाने वाले
वो कौन हैं -
भारत के वीर जवान -
अनय कभी ना सहने वाले
न्याय पक्ष में रहने वाले
वो कौन हैं -
भारत के वीर जवान -

जननी
जन्म भूमि से बढ़कर
कोई स्वर्ग नहीं -
इस पर सर्वस्व समर्पण -सा
कोई उत्सर्ग नहीं -
भारत को स्वर्ग बानाने वाले
अपना सर्वस्व लुटाने वाले
वो कौन हैं -
भारत के वीर जवान -

जीवन
आहुति देने वाले
' विजयश्री लेने वाले
वो कौन हैं -
भारत के वीर जवान -

वीर
प्रसविनी वसुंधरा -सा
कोई धीर नहीं -
भारत माँ के वीरों जैसा
कोई वीर नहीं -
पद-रज पावन चन्दन उनकी
जन गण करता वंदन जिनकी
वो कौन हैं -
भारत के वीर जवान -

युद्ध
- क्रांति लहराने वाले
शान्ति ध्वजा फहराने वाले
वो कौन हैं -
भारत के वीर जवान -2



प्यारी हिन्दी

प्यारी हिन्दी
वतन की आन है 'शान है प्यारी हिन्दी
हमारी जान है पहचान है प्यारी हिन्दी।

मधुर पय पान किया इसने देव वाणी का
अटल वरदान लिया मातु वीणापाणी का।
सतत बहती है सलिल सहजभाव धारासी
हमारे हिन्द
का ईमान है प्यारी हिन्दी
वतन की ----------

सागर से हिमालय तक है सबकी प्यारी आशा
जन -गण- मन जोड़ती है हिन्दी हमारी भाषा।
बिगुल बनी बल्लभ की शंख- नाद शंकर का
संत कवियों का मधुरगान है प्यारी हिन्दी
वतन की ----------

गंग-जल- धार बही गंग के कवित्तों की
विमलसा प्यार रही बंग कवि चित्तों की
जायसी का राग बनी मोहा मन रहिमन का
प्यारे रसखान का अभिमान है प्यारी हिन्दी
वतन की ---------

आभा बनी नाभा की 'बनी कंठ सूरा की
रविदास की भक्ति 'रागिनी कबीरा की
नरहरि की चहेती अनुराग बनी तुलसी का
मुदितमन मीरा का सम्मान है प्यारी हिन्दी
वतन की ---------।

हुंकार बनी भूषण की तलवार कवि चंद की
केशव की
बनी छंद अलंकार घनानंद की
सेतु पद्माकर की रत्नाकर- घट बिहारी का
रीतिकवि काल का श्रृंगार है प्यारी हिन्दी
वतन की ---------।
सितारे हिंद का दुलार' पुकार हरीचंद की
दिनकर की दहाड़ मानव प्यार प्रेमचंद की
माखन की देश-भक्ति है रहस्य अज्ञेय का
राष्ट्रकवियों का प्राणगान है प्यारी हिन्दी
वतन की ---------।

इसको प्रसाद ने निज आंसुओं में ढाला है
प्रकृत बनी पन्त की बच्चन की हाला है
पीड़ा महादेवी की अवदान है निराला का
वाणी के सपूतों का मान है प्यारी हिन्दी
वतन की ---------।

Sunday, November 23, 2008

कामाख्या

कामाख्या
साध थी कि
यात्रा करुँ कामाख्या धाम की
पावन पुनीत
आदिशक्ति शुभ ठाम की
सुंदर सुनाम
धरा रूप काम जो
विदित सर्वत्र है
कामरूप नाम सो

पुराणों का साक्ष्य
और हेतु यों पुष्ट हैं -
किया मदन मर्दन था
कभी शिवशंकर ने
काम क्षय किया था
तभी प्रलयंकर ने

कामेश्वरी आदिशक्ति ने
प्रतिष्ठा पायी जहाँ थी
कामाख्या के नाम पर
शक्तिपीठ बनी वहां थी
तब से पुण्य-स्थल
कामरूप जाना जाता है
कामेश्वरी की पीठ
कामाख्या माना जाता है

पहुंचते ही कामरूप
विशेषता मैंने पायी
कामेश्वरी प्रासाद की
छटा मम मन छायी
प्रासाद कामेश्वरी का
गिरि श्रृंग पर सोहता
नीचे मेखला-सा
ब्रह्मपुत्र मोहता

नैसर्गिकता संकुलवत
आह्वान कराती जन का
पावन अपूर्व छटा
संताप हरती तन का
महिमा सर्वत्र मिली
पुरातन प्रसंग की
भासतीहै आभा यहाँ
मौलिक अनंग की

निहारते ही दृश्य
मन मुग्ध होता पथिक का
प्रतीक्षारत प्रस्तर मार्ग
जो निर्मित नरकासुर का
अधः से ऊर्ध्व ओर
उन्मुख होते हैं ज्यों
जिज्ञासा माँ दर्शन की
अतीव हो उठती त्यों

विषम पथ शिला खण्ड
टटोलते भक्त मन को
है शक्ति कितनी '
भक्ति कितनी जन को
भक्ति की शक्ति का
यदि अहम् हुआ मन में
गंतव्य तक पहुंचना
अपवाद है जीवन में।

आशा -विश्वास का
संबल सबल जिनको
दुर्गम नितांत दूरी
संवरण सरल उनको
मार्ग मनमोहक है
रंगीन विटप पुष्पों से
सुंदर सलोने दृश्य ज्यों
सौन्दर्य कोटि गुच्छों से

चहुँ और घनघोर कुञ्ज
अवगुंठित आबद्ध हैं
लक्षित वे होते ज्यों
स्वागत सन्नद्ध हैं
स्वस्थ अनुरंजन है
ललाम नियति नटी द्वारा
पहुँचा सिंह द्वार ज्यों
तत्काल माँ को पुकारा

देखा भक्त जनों को
समवेत जयघोष करते
करते अनुष्ठान जन -
मन में प्रिय भक्ति भरते
पूछा माँ का प्रताप
बताया यों भक्तों ने
प्रभुता मद पाययज्ञ
ठाना नृप दक्ष ने

सम्मान-सद्भाव से
आमंत्रित किए सभी देव
किंतु अवमानना से
अनामंत्रित रहे महादेव
यज्ञ आरम्भ हुआ जहाँ
पहुंचे सभी देवी देव
अनामंत्रण से तटस्थ रह ,

नहीं गए महादेव

सुन बात पितृ यज्ञ की
सती सस्मित हुयीं
पर स्वामी अनामंत्रित पाय
व्यथित और विस्मित हुयीं
आमंत्रण नहीं दिया पितृ!
क्या मैंने अपराध किया
व्यथित मन विकल भाव
व्रत जाने का ठान लिया

आग्रह किया पति से -
गमनातुर दक्ष जाया ने
समझाया तब जाती ने
नहिं माना महामाया ने
कान दिया सती ने
ध्यान दिया किंचित
होनी अशुभ जान
भूत भावन हुए चिंतित।

भेज गण साथ तब
सती को विदा किया
कल्याण हो देवि यों
शिव ने वरदान दिया
साधना में लीन हो
समाधिस्थ हुए शिव
पर संशय सती का
घटित हुआ था इव

देखा पहुँच सती ने
कि लगा देव मेला
पाया शिवशंकर को
अनामंत्रित अकेला
आमोदित स्वजन वहां
सभी मिले दिल से
पर देख सती प्रजापति
अंतर्मन -झुलसे

कटाक्ष किया दक्ष ने
कि बावला नहीं आया
मान घटा मेरा
तूने ऐसा वर पाया
तिरस्कृत सती ने
पति का ध्यान किया
कुपित हो पिता को
तत्काल ही श्राप दिया

पूरा नहीं होगा यज्ञ
नाश होगा तेरा
त्यागूंगी प्राण मैं
विश्वास अटल मेरा
इतना कह सती
कूदी यज्ञ कुण्ड में
हाहाकार मचा तब
देवों के झुंड में

देह त्यागी सती ने
संदेश शिव ने पाया
क्रोधातुर तब रुद्र ने
वीरभद्र उपजाया
नाश करो दक्ष का
आदेश यों सुनाया
' यज्ञ विध्वंस का
अस उपक्रम रचाया।

दक्ष की यज्ञ में
वीरभद्र आया '
यज्ञकुंड में आहुत
उसने सतीगात पाया
दृश्य देख दुखी हो
शिवजी को ध्याया
उग्र रूप धारण कर
उपद्रव मचाया

सती देह त्याग देख
वीरभद्र क्रुद्ध हुआ
काटा शीश दक्ष का
यज्ञ अवरुद्ध हुआ
कटा शीश दक्ष का
जला यज्ञ कुंड में
नैराश्य छा गया
वहां देवों के झुंड में

यज्ञ विध्वंस कर
दक्ष का अंत किया
प्रतिशोध मातु प्राणों का
उसने अविलम्ब लिया
देखा विक्षिप्त -
से
शिवजी वहाँ आए
अधजला गात सती का
स्कंध धार धाये

उन्मत्त हो शंकर ने
तांडव रचाया
रौद्र रूप रुद्र ने
सृष्टि में दिखाया
दृश्य देख विष्णु का
मन भर आया
उद्यम तत्काल सोच
सुदर्शन उठाया


अवयव कटें सतीगात
चक्र यों चलाया
काट एक-एक अंग
क्षिति पर गिराया
यहाँ वहाँ जहाँ तहाँ
पाँव पड़े जती के
वहीं वहीं हर कहीं
अंग गिरे सती के

कहीं गिरे हाथ पाँव
कहीं गिरी अक्षि
कहीं गिरा उदर और
कहीं गिरा वक्ष
और कहीं अन्य अंग
कहीं गिरी यौन
होता रहा चमत्कार
' शिवजी रहे मौन

जो शिव का अवधान
वही विधि का विधान
सती अंग गिरे जहाँ
शक्तिपीठ जगी वहाँ
कहीं हुई वैष्णों
कहीं विंध्यवासिनी
कहीं हिमवानसुता
कहीं सिंह आसिनी

कामेश्वरी हुई यहाँ
हो पूर्ण कामना वहाँ
हो सिक्त भावना जहाँ
' रिक्त वासना तहाँ
प्रतिष्ठित हुई शक्तिपीठ
कामेश्वरी की जब से
असंख्य भक्त होते
हैं पूर्णकाम तब से।

वृत्तियाँ कपाल में
नर के जो छायीं
नर'' असुर रूप में
तत्क्षण वहाँ धायीं
योंही वहाँ एक दिन
नरकासुर आया
प्रणय -शर उसने
सती पर चलाया।

मोहा देख देवी को
मन में ललचाया
' अपनी आसक्ति
का भेद सब सुनाया
देवी ने भाँप लिया
असुर महाबली है
निष्णात षड्यंत्रों में
और बड़ा छली है

शक्ति ने युक्ति से
उपक्रम ऐसा किया
बुला निकट असुर को
आदर-सम्मान दिया
प्रस्ताव निज देवी ने
अधम को सुनाया
शैल-पाद-श्रृंग तक
बने मार्ग यों बताया

शर्त एक और है
सुनलो हमारी
उषापूर्व रात ही में
बने राह सारी
ऐसे एक रात में यदि
मार्ग तुम बनाओगे
तो जानूँगी निश्चित ही
तुम मुझको अपनाओगे

अनुरूप मेरी शर्त के
नहिं काम कर पाओगे
तो दूँगी श्राप निश्चित ही
भस्म तुम हो जाओगे
यों बात सुन कामेश्वरी की
असुर मन हर्षित हुआ
उसको जगत में आज तक
नहिं बड़ा काम दर्शित हुआ

अनुरूप उसने शक्ति के
प्रस्ताव के उद्यम किया
सम्पूर्ण सेना जुट गई
नहिं काम को मद्दिम किया
अति तीव्र गति तूफानसी
उस मार्ग के निर्माण की
बाजी लगी बल कीर्ति
एवं आसुरी अभिमान की

पाद पर्वत से शिखर तक
राह लगभग हुई पूरी
विकलता थी असुर मन में
साध अब तक थी अधूरी
रात्रि आधी शेष थी पर
कार्य होते पूर्ण पाया
आह्वान करके देव इक
अविलंब देवी ने बुलाया

शक्ति की महिमा निराली
व्यूह इक नूतन रचाया
बनो कुक्कुट बांग दो
देव को ऐसा सुनाया
कुक्कुट बना देव
और कुकुड़ूँकू बोला
मुर्गे की बांग सुन
असुर मन डोला

हुआ कार्य पूर्ण नहीं
'
हो गया सवेरा
दुखी हुआ नरक
जिसे संशय ने घेरा
आया याद शक्ति श्राप
असुर घबराया
बंद किया शेष काम
सैन्यबल हटाया

गौरव अपना शक्ति ने
यों कलंक से बचाया
रहा किंतु अशांत मन
विचार एक आया
दक्षसुता रूप में -
अपमान सहा जितना
असुर क्रूरता-कलंक
नहीं रहा उतना

पिता दक्ष जैसे सुर से
अपमान सहा जितना
असुर नरकासुर से
नहिं हुआ भान उतना
व्यंग्य -वाण असह्य हुए
त्यागना पड़ा जो गात
शत्रु हम कहें किसे ?यदि
हो किसी का ऐसा तात

अवज्ञा अपराध हुआ -
पति की बात मानी
ग्लानिमना सती ने
प्रतिशोध कीपिता से ठानी
यज्ञ की अपूर्णता ही
देवों की हार थी
कैसे करुँ पूर्ण इसे
एक ही पुकार थी

सत् का उपहास जहाँ
शिव का अभाव हो
सुन्दरतम सृष्टि का
वहाँ क्यों प्रभाव हो
विनाश ही विनाश जहाँ
हर प्रश्न अनबूझा
समवेत सुर सोचते
उपाय एक सूझा

यज्ञ होगा पूर्ण यदि
शिवजी प्रसन्न हों
अन्यथा अपूर्ण चाहे
अज ही आसन्न
हों
समवेत सभी सुरों ने
शिव को पुकारा
हे प्रभु कल्याण करें
दास हूँ तुम्हारा

देवों की पुकार सुन
अवढर आसन्न हुए
देखी दशा दक्ष की
अतिशय प्रसन्न हुए
सुन आर्तनाद देवों का
शिव प्रहसन रचाया
अजसुत हों देव क्यों
हो अज ही की काया

चाहते हों सफल यज्ञ
दक्ष को जिलाएँ
लायें शीश बकरे का
इनके लगायें
किया गया वही
जो शंभू ने चाहा
यज्ञ हुआ पूर्ण
जिसे सभी ने सराहा

यज्ञ पूर्ण होते ही
शक्ति को विदित हुआकि
आज अज मुंड पितृ-
रुण्ड पर उदित हुआ
मानी अभिमानी पिता -
दक्ष ने विद्रूप किया
शिव ने उसे देवता से
अज-सा कुरूप दिया

अज का स्व- रूप पाया
रहा देव रूप जिसका
उसने अपराध किया
मिला दंड उसका
नरकासुर शीश हो
या दक्ष जैसे सुर का
चिंतन समान जैसा
रहा इक असुर का

सुर हो असुर हो
याकि कोई नर हो
स्वर्ग हो नरक हो
याकि कोई घर हो
अहं की दुहाई जहाँ
नहीं कोई डर हो
शून्यता विवेक की
विलोम जहाँ हर हो

आचरण समान होगा
घर हो या डगर हो
उनमें भेद होगा
सुर हो या असुर हो
प्रतिष्ठा शक्तिपीठ की
अब भी उसी रूप में
आराध्य बनी सबकी
जो रही कामरूप में

शैव हों या शाक्त सभी
माँ का जयगान करते
कामेश्वरी प्रसन्न हों
ऐसा बलिदान करते
वितृष्णा कामेश्वरी को
थी पितृ कदाचार से
अज बलि चढ़े ,मिटे
तृष्णा अनाचार से

प्रथा बलिदान की है
अतिशय पुरातन
अज का बलिदान क्यों
चला आया है सनातन ?
भक्तजन प्रथा ऐसी
आज भी पाल रहे
अतिचार नहिं त्यागते
निरीह पशु घाल रहे

बलिदान में कपोतों को
कुछ तो मरोड़ लेते हैं
और कुछ देवी के
नाम छोड़ देते हैं
करना बलिदान यदि
तो बकरे का क्यों ?
करना बलिदान यदि
तो कपोतों का क्यों ?

करना बलिदान यदितो
करो आसुरी
वृत्ति का
करना बलिदान यदि तो
करो अधार्मिक
पृवृत्ति का
प्रताप आदिशक्ति का
उन भक्तों ने बताया
' समवेत श्रद्धानत
जयघोष तब लगाया

वंदना करूँ मैं सदा
शक्ति के उस रूप की
ममता लुटाते सदा
माँ के स्वरुप की
देवी तो देती राह
दृष्टा के रूप में
होती सहाय सदा
सृष्टा के रूप में

वो ही निकाले हमें
संकट के कूप से
वो ही उबारे हमें
चरित्र के विद्रूप से
देवी सदा देती ,नहिं
लेती किसी रूप में
महिमा समाई उसकी
विराट के स्वरुप में

देवी सदा देती प्यार
माँ के स्वरुप में
वो ही है देती ज्ञान
भारती के रूप में
ऐसे मातु चरणों की
मैं आरती उतारूँ
सारे श्रम संचित फल
उन पर सहज वारूँ



मैं और तुम

मैं और तुम
मैं वृक्ष हूँ
और
तुम मनु पुत्र मानव !
मुझे जब कोई प्रताड़ित करता
तो
द्रवित हो देता फल /छाया
पर
तुम तो लघु आघात से तड़प उठते हो ,
अपकार करते हो निर्दयता से
हे श्रेष्ठ सृष्टि !
औदर्य चाहिए ?
मेरे पास है ,
मैं देना भी चाहता हूँ ;क्योंकि
मानव विपन्न हो गया है इससे ,
वैमनस्य में डूबा
मैं (जड़)
जड़(मानव) को चेतन बना ,
सौहार्द्र सौंप
चाहता हूँ दायित्व मुक्ति
यदि पा सकूँ !

अंकुर

अंकुर
आभा (मुक्तिबोध साहित्य सरणी पाथाखेडा जिला बेतुल मध्यप्रदेश ) में प्रकाशित (फरवरी 1999)
गले बीज ' फूटे अंकुर
जल थल के अनुकूलन से
उर्वर धरती की गोद पाय
तरु लदे पात फल फूलन से।

उन्नीस सदी एकादस सन
की ज्येष्ठ पूर्णिमा थी आई
वैद्यनाथ का जन्म हुआ
प्राची में अरुणाई छाई
मिटीं रूढियां गुरु समाज की
वैषम्य द्वेष उन्मूलन से
गले बीज औ' फूटे अंकुर
जल थल के अनुकूलन से।

पावन दामन में पले बढ़े
शुभ्र सुघड़ जीवन पाया
शिक्षा दीक्षा ज्यों पूर्ण हुई
त्यों बौद्ध धर्म था अपनाया
अनुराग बढ़ा पायी निजात
मानवता के प्रतिकूलन से
गले बीज औ' फूटे अंकुर
जल थल के अनुकूलन से।

था मन गृहस्थ तन यायावर
साहित्यकार जीवन पाया
करुणा संपूरित मिला ह्रदय
जन गण वाणी को अपनाया
शाश्वत मूल्यों की धार बही
जीवन सरिता के कूलन से
गले बीज औ' फूटे अंकुर
जल थल के अनुकूलन से।

निष्पक्ष सरल लेखन अद्भुत
औ' संत कबीरी फक्कड़पन
परवर्ती बने निराला के
पाया वैसा ही अक्खडपन
विद्रोही स्वर साहस असीम
हर पल खेले वे शूलन से
गले बीज औ' फूटे अंकुर
जल थल के अनुकूलन से।

संवेदन गंध लुटाय चला
प्रतिबद्ध रहा जो हर पल में
सत्तासी की चिर आयु पाय
इक सदी मुखर नागार्जुन में
श्रृद्धा अर्पण शत-शत वंदन
भाव- अश्रु फल- फूलन से
गले बीज औ' फूटे अंकुर
जल थल के अनुकूलन से




Saturday, November 22, 2008

माँ

माँ
आभा (मुक्तिबोध साहित्य सरणी पाथाखेडा जिला बेतुल मध्यप्रदेश ) में प्रकाशित (दिसम्बर 1998)
हे जननि मम प्राण हो तुम
और माँ वरदान हो तुम !
अवनि अम्बर में सृजन का
जननि मूलाधार बनती
सृष्टि की नव सर्जना में
कृष्टि के माँ रंग भरती
व्यष्टि के मोती संजोये
जगत का कल्याण हो तुम
हे जननि मम प्राण हो तुम
और माँ वरदान हो तुम !

जीव
जड़- चेतन जहाँ तक
जननि मिलती हर किसी को
पुण्य संचय फलित जिसका
माँ मिली है बस उसी को
ममतामयी जो माँ सदा वो
मनुज का उत्थान हो तुम
हे जननि मम प्राण हो तुम
और माँ वरदान हो तुम !

विष्णु
शिव अज अंजनीसुत
व्यास लवकुश औ' षडानन
भरत गंगापुत्र पांडव
कृष्ण गौतम औ' गजानन
इन सभी की कीर्ति हो माँ
सुयश औ' अवदान हो तुम
हे जननि मम प्राण हो तुम
और माँ वरदान हो तुम !

जननि
ममता वृष्टि कर दे
मातु समता दृष्टि भर दे
सदय
हो जग नया स्वर दे
भेद
भूलें यही वर दे
मंदिरों की आरती हो
मस्जिद-ऐ-अजान हो तुम
हे जननि मम प्राण हो तुम
और माँ वरदान हो तुम !