सारनी
सुंदर- सुरम्य- धरा
अंचल हरीतिमाका
जो तप्त जन मानस
को शीतल फुहार दे।
नगरी अनूप अतुल
श्रेणी सतपुड़ा मध्य
म्लानमन मानवको
अम्लान करि कारदे।
अंक जो करंक धारे
जिसे प्रकृति श्रृंगारे
मन तू कलुष त्याग
मानव को प्यार दे।
नगरी कोलविद्युत की
सहचरी सहभाग की
जहाँ सहकर्मियों का
श्रम- संबल बहार दे।
श्रम के सपूत जो हैं
शिष्य विश्वकर्मा के
इनका श्रम महायज्ञ
दैन्य को नकार दे ।
नगरी सौदामिनी की
नगर को उजियार दे
आजीविकाधार जो
जन-जीवन संवार दे।
नगर-वन-पर्वत-डगर में
ज्ञान का आलोक छिटके
मानव विनय-नत सदा
हो अपनत्व का संसारदे।
उत्तुंग गिरिशिखर पर
विराजते हैं मठार देव
शिवमहिमा अपार जो
पल में पतित तार दे ।
श्लेष है सारनी में सार ले औ' सार दे
सारहीन अर्थों को सारदे विसार दे ,
कि -
सारहीन कर्मों को सार देवि सार दे।
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