Thursday, November 27, 2008

मुक्तिदूत

मुक्तिदूत
आभा (मुक्तिबोध साहित्य सरणी पाथाखेडा जिला बेतुल मध्यप्रदेश ) में प्रकाशित (दिसम्बर 1997)
हे साधक !
पारस को खोजते हैं लोग
अकिंचन धातु सोना बनने के लिए
पर;
तुमने तो जो भी पत्थर छुआ
वही पारस बन गया
कहीं ऐसा तो नहीं कि -
तुम्हारे अहर्निश का श्रम हो
ये पारस

हे पथिक !
पथ को खोजते हैं लोग
निर्बाध यात्रा के लिए
पर तुम जिधर से निकले
वहीं पथ बन गया
कहीं ऐसा तो नहीं कि -
तुम्हारे संघर्षों का सुफल हो
ये पथ

हे माधव !
मधुवन को खोजते हैं लोग
श्रांति मिटने के लिए
पर;
तुम तो जहाँ भी रमे
वहीं मधुवन हो गया
कहीं ऐसा तो नहीं कि -
तुम्हारे मधु /तुम्हारे प्यार का
सुंदर उपहार हो
ये मधुवन

हे मनीषी !
मनीषा के चंचल हाथों में
रिक्त साहित्य दीप
थमा देते हैं लोग
अंधकार में भटकाव के लिए
पर;
तुमने तो हर दीप को
स्नेह पूरित किया है /
नई ज्योति दी है
कहीं ऐसा तो नहीं कि -
ये स्नेह /ये तेल
तुम्हारे अंतस की पीड़ा हो
जिसने मानव के निकट ला दिया है
ये साहित्य

तुम साधक हो /पथिक हो
माधव हो /मनीषी हो और
हो असीम व्यक्तित्व !
ये पारस /ये पथ
ये मधुवन /ये साहित्य क्या हैं?
ये हैं तुम्हारे व्यक्तित्व से
छिटके ओज -बिन्दु और
मानवता के आधार
इनसे हम पायें नया बोध
नई दिशा /नया शोध क्योंकि
इन्हीं में समाया है मुक्तिबोध


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