Sunday, November 23, 2008

कामाख्या

कामाख्या
साध थी कि
यात्रा करुँ कामाख्या धाम की
पावन पुनीत
आदिशक्ति शुभ ठाम की
सुंदर सुनाम
धरा रूप काम जो
विदित सर्वत्र है
कामरूप नाम सो

पुराणों का साक्ष्य
और हेतु यों पुष्ट हैं -
किया मदन मर्दन था
कभी शिवशंकर ने
काम क्षय किया था
तभी प्रलयंकर ने

कामेश्वरी आदिशक्ति ने
प्रतिष्ठा पायी जहाँ थी
कामाख्या के नाम पर
शक्तिपीठ बनी वहां थी
तब से पुण्य-स्थल
कामरूप जाना जाता है
कामेश्वरी की पीठ
कामाख्या माना जाता है

पहुंचते ही कामरूप
विशेषता मैंने पायी
कामेश्वरी प्रासाद की
छटा मम मन छायी
प्रासाद कामेश्वरी का
गिरि श्रृंग पर सोहता
नीचे मेखला-सा
ब्रह्मपुत्र मोहता

नैसर्गिकता संकुलवत
आह्वान कराती जन का
पावन अपूर्व छटा
संताप हरती तन का
महिमा सर्वत्र मिली
पुरातन प्रसंग की
भासतीहै आभा यहाँ
मौलिक अनंग की

निहारते ही दृश्य
मन मुग्ध होता पथिक का
प्रतीक्षारत प्रस्तर मार्ग
जो निर्मित नरकासुर का
अधः से ऊर्ध्व ओर
उन्मुख होते हैं ज्यों
जिज्ञासा माँ दर्शन की
अतीव हो उठती त्यों

विषम पथ शिला खण्ड
टटोलते भक्त मन को
है शक्ति कितनी '
भक्ति कितनी जन को
भक्ति की शक्ति का
यदि अहम् हुआ मन में
गंतव्य तक पहुंचना
अपवाद है जीवन में।

आशा -विश्वास का
संबल सबल जिनको
दुर्गम नितांत दूरी
संवरण सरल उनको
मार्ग मनमोहक है
रंगीन विटप पुष्पों से
सुंदर सलोने दृश्य ज्यों
सौन्दर्य कोटि गुच्छों से

चहुँ और घनघोर कुञ्ज
अवगुंठित आबद्ध हैं
लक्षित वे होते ज्यों
स्वागत सन्नद्ध हैं
स्वस्थ अनुरंजन है
ललाम नियति नटी द्वारा
पहुँचा सिंह द्वार ज्यों
तत्काल माँ को पुकारा

देखा भक्त जनों को
समवेत जयघोष करते
करते अनुष्ठान जन -
मन में प्रिय भक्ति भरते
पूछा माँ का प्रताप
बताया यों भक्तों ने
प्रभुता मद पाययज्ञ
ठाना नृप दक्ष ने

सम्मान-सद्भाव से
आमंत्रित किए सभी देव
किंतु अवमानना से
अनामंत्रित रहे महादेव
यज्ञ आरम्भ हुआ जहाँ
पहुंचे सभी देवी देव
अनामंत्रण से तटस्थ रह ,

नहीं गए महादेव

सुन बात पितृ यज्ञ की
सती सस्मित हुयीं
पर स्वामी अनामंत्रित पाय
व्यथित और विस्मित हुयीं
आमंत्रण नहीं दिया पितृ!
क्या मैंने अपराध किया
व्यथित मन विकल भाव
व्रत जाने का ठान लिया

आग्रह किया पति से -
गमनातुर दक्ष जाया ने
समझाया तब जाती ने
नहिं माना महामाया ने
कान दिया सती ने
ध्यान दिया किंचित
होनी अशुभ जान
भूत भावन हुए चिंतित।

भेज गण साथ तब
सती को विदा किया
कल्याण हो देवि यों
शिव ने वरदान दिया
साधना में लीन हो
समाधिस्थ हुए शिव
पर संशय सती का
घटित हुआ था इव

देखा पहुँच सती ने
कि लगा देव मेला
पाया शिवशंकर को
अनामंत्रित अकेला
आमोदित स्वजन वहां
सभी मिले दिल से
पर देख सती प्रजापति
अंतर्मन -झुलसे

कटाक्ष किया दक्ष ने
कि बावला नहीं आया
मान घटा मेरा
तूने ऐसा वर पाया
तिरस्कृत सती ने
पति का ध्यान किया
कुपित हो पिता को
तत्काल ही श्राप दिया

पूरा नहीं होगा यज्ञ
नाश होगा तेरा
त्यागूंगी प्राण मैं
विश्वास अटल मेरा
इतना कह सती
कूदी यज्ञ कुण्ड में
हाहाकार मचा तब
देवों के झुंड में

देह त्यागी सती ने
संदेश शिव ने पाया
क्रोधातुर तब रुद्र ने
वीरभद्र उपजाया
नाश करो दक्ष का
आदेश यों सुनाया
' यज्ञ विध्वंस का
अस उपक्रम रचाया।

दक्ष की यज्ञ में
वीरभद्र आया '
यज्ञकुंड में आहुत
उसने सतीगात पाया
दृश्य देख दुखी हो
शिवजी को ध्याया
उग्र रूप धारण कर
उपद्रव मचाया

सती देह त्याग देख
वीरभद्र क्रुद्ध हुआ
काटा शीश दक्ष का
यज्ञ अवरुद्ध हुआ
कटा शीश दक्ष का
जला यज्ञ कुंड में
नैराश्य छा गया
वहां देवों के झुंड में

यज्ञ विध्वंस कर
दक्ष का अंत किया
प्रतिशोध मातु प्राणों का
उसने अविलम्ब लिया
देखा विक्षिप्त -
से
शिवजी वहाँ आए
अधजला गात सती का
स्कंध धार धाये

उन्मत्त हो शंकर ने
तांडव रचाया
रौद्र रूप रुद्र ने
सृष्टि में दिखाया
दृश्य देख विष्णु का
मन भर आया
उद्यम तत्काल सोच
सुदर्शन उठाया


अवयव कटें सतीगात
चक्र यों चलाया
काट एक-एक अंग
क्षिति पर गिराया
यहाँ वहाँ जहाँ तहाँ
पाँव पड़े जती के
वहीं वहीं हर कहीं
अंग गिरे सती के

कहीं गिरे हाथ पाँव
कहीं गिरी अक्षि
कहीं गिरा उदर और
कहीं गिरा वक्ष
और कहीं अन्य अंग
कहीं गिरी यौन
होता रहा चमत्कार
' शिवजी रहे मौन

जो शिव का अवधान
वही विधि का विधान
सती अंग गिरे जहाँ
शक्तिपीठ जगी वहाँ
कहीं हुई वैष्णों
कहीं विंध्यवासिनी
कहीं हिमवानसुता
कहीं सिंह आसिनी

कामेश्वरी हुई यहाँ
हो पूर्ण कामना वहाँ
हो सिक्त भावना जहाँ
' रिक्त वासना तहाँ
प्रतिष्ठित हुई शक्तिपीठ
कामेश्वरी की जब से
असंख्य भक्त होते
हैं पूर्णकाम तब से।

वृत्तियाँ कपाल में
नर के जो छायीं
नर'' असुर रूप में
तत्क्षण वहाँ धायीं
योंही वहाँ एक दिन
नरकासुर आया
प्रणय -शर उसने
सती पर चलाया।

मोहा देख देवी को
मन में ललचाया
' अपनी आसक्ति
का भेद सब सुनाया
देवी ने भाँप लिया
असुर महाबली है
निष्णात षड्यंत्रों में
और बड़ा छली है

शक्ति ने युक्ति से
उपक्रम ऐसा किया
बुला निकट असुर को
आदर-सम्मान दिया
प्रस्ताव निज देवी ने
अधम को सुनाया
शैल-पाद-श्रृंग तक
बने मार्ग यों बताया

शर्त एक और है
सुनलो हमारी
उषापूर्व रात ही में
बने राह सारी
ऐसे एक रात में यदि
मार्ग तुम बनाओगे
तो जानूँगी निश्चित ही
तुम मुझको अपनाओगे

अनुरूप मेरी शर्त के
नहिं काम कर पाओगे
तो दूँगी श्राप निश्चित ही
भस्म तुम हो जाओगे
यों बात सुन कामेश्वरी की
असुर मन हर्षित हुआ
उसको जगत में आज तक
नहिं बड़ा काम दर्शित हुआ

अनुरूप उसने शक्ति के
प्रस्ताव के उद्यम किया
सम्पूर्ण सेना जुट गई
नहिं काम को मद्दिम किया
अति तीव्र गति तूफानसी
उस मार्ग के निर्माण की
बाजी लगी बल कीर्ति
एवं आसुरी अभिमान की

पाद पर्वत से शिखर तक
राह लगभग हुई पूरी
विकलता थी असुर मन में
साध अब तक थी अधूरी
रात्रि आधी शेष थी पर
कार्य होते पूर्ण पाया
आह्वान करके देव इक
अविलंब देवी ने बुलाया

शक्ति की महिमा निराली
व्यूह इक नूतन रचाया
बनो कुक्कुट बांग दो
देव को ऐसा सुनाया
कुक्कुट बना देव
और कुकुड़ूँकू बोला
मुर्गे की बांग सुन
असुर मन डोला

हुआ कार्य पूर्ण नहीं
'
हो गया सवेरा
दुखी हुआ नरक
जिसे संशय ने घेरा
आया याद शक्ति श्राप
असुर घबराया
बंद किया शेष काम
सैन्यबल हटाया

गौरव अपना शक्ति ने
यों कलंक से बचाया
रहा किंतु अशांत मन
विचार एक आया
दक्षसुता रूप में -
अपमान सहा जितना
असुर क्रूरता-कलंक
नहीं रहा उतना

पिता दक्ष जैसे सुर से
अपमान सहा जितना
असुर नरकासुर से
नहिं हुआ भान उतना
व्यंग्य -वाण असह्य हुए
त्यागना पड़ा जो गात
शत्रु हम कहें किसे ?यदि
हो किसी का ऐसा तात

अवज्ञा अपराध हुआ -
पति की बात मानी
ग्लानिमना सती ने
प्रतिशोध कीपिता से ठानी
यज्ञ की अपूर्णता ही
देवों की हार थी
कैसे करुँ पूर्ण इसे
एक ही पुकार थी

सत् का उपहास जहाँ
शिव का अभाव हो
सुन्दरतम सृष्टि का
वहाँ क्यों प्रभाव हो
विनाश ही विनाश जहाँ
हर प्रश्न अनबूझा
समवेत सुर सोचते
उपाय एक सूझा

यज्ञ होगा पूर्ण यदि
शिवजी प्रसन्न हों
अन्यथा अपूर्ण चाहे
अज ही आसन्न
हों
समवेत सभी सुरों ने
शिव को पुकारा
हे प्रभु कल्याण करें
दास हूँ तुम्हारा

देवों की पुकार सुन
अवढर आसन्न हुए
देखी दशा दक्ष की
अतिशय प्रसन्न हुए
सुन आर्तनाद देवों का
शिव प्रहसन रचाया
अजसुत हों देव क्यों
हो अज ही की काया

चाहते हों सफल यज्ञ
दक्ष को जिलाएँ
लायें शीश बकरे का
इनके लगायें
किया गया वही
जो शंभू ने चाहा
यज्ञ हुआ पूर्ण
जिसे सभी ने सराहा

यज्ञ पूर्ण होते ही
शक्ति को विदित हुआकि
आज अज मुंड पितृ-
रुण्ड पर उदित हुआ
मानी अभिमानी पिता -
दक्ष ने विद्रूप किया
शिव ने उसे देवता से
अज-सा कुरूप दिया

अज का स्व- रूप पाया
रहा देव रूप जिसका
उसने अपराध किया
मिला दंड उसका
नरकासुर शीश हो
या दक्ष जैसे सुर का
चिंतन समान जैसा
रहा इक असुर का

सुर हो असुर हो
याकि कोई नर हो
स्वर्ग हो नरक हो
याकि कोई घर हो
अहं की दुहाई जहाँ
नहीं कोई डर हो
शून्यता विवेक की
विलोम जहाँ हर हो

आचरण समान होगा
घर हो या डगर हो
उनमें भेद होगा
सुर हो या असुर हो
प्रतिष्ठा शक्तिपीठ की
अब भी उसी रूप में
आराध्य बनी सबकी
जो रही कामरूप में

शैव हों या शाक्त सभी
माँ का जयगान करते
कामेश्वरी प्रसन्न हों
ऐसा बलिदान करते
वितृष्णा कामेश्वरी को
थी पितृ कदाचार से
अज बलि चढ़े ,मिटे
तृष्णा अनाचार से

प्रथा बलिदान की है
अतिशय पुरातन
अज का बलिदान क्यों
चला आया है सनातन ?
भक्तजन प्रथा ऐसी
आज भी पाल रहे
अतिचार नहिं त्यागते
निरीह पशु घाल रहे

बलिदान में कपोतों को
कुछ तो मरोड़ लेते हैं
और कुछ देवी के
नाम छोड़ देते हैं
करना बलिदान यदि
तो बकरे का क्यों ?
करना बलिदान यदि
तो कपोतों का क्यों ?

करना बलिदान यदितो
करो आसुरी
वृत्ति का
करना बलिदान यदि तो
करो अधार्मिक
पृवृत्ति का
प्रताप आदिशक्ति का
उन भक्तों ने बताया
' समवेत श्रद्धानत
जयघोष तब लगाया

वंदना करूँ मैं सदा
शक्ति के उस रूप की
ममता लुटाते सदा
माँ के स्वरुप की
देवी तो देती राह
दृष्टा के रूप में
होती सहाय सदा
सृष्टा के रूप में

वो ही निकाले हमें
संकट के कूप से
वो ही उबारे हमें
चरित्र के विद्रूप से
देवी सदा देती ,नहिं
लेती किसी रूप में
महिमा समाई उसकी
विराट के स्वरुप में

देवी सदा देती प्यार
माँ के स्वरुप में
वो ही है देती ज्ञान
भारती के रूप में
ऐसे मातु चरणों की
मैं आरती उतारूँ
सारे श्रम संचित फल
उन पर सहज वारूँ



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