Sunday, November 23, 2008

मैं और तुम

मैं और तुम
मैं वृक्ष हूँ
और
तुम मनु पुत्र मानव !
मुझे जब कोई प्रताड़ित करता
तो
द्रवित हो देता फल /छाया
पर
तुम तो लघु आघात से तड़प उठते हो ,
अपकार करते हो निर्दयता से
हे श्रेष्ठ सृष्टि !
औदर्य चाहिए ?
मेरे पास है ,
मैं देना भी चाहता हूँ ;क्योंकि
मानव विपन्न हो गया है इससे ,
वैमनस्य में डूबा
मैं (जड़)
जड़(मानव) को चेतन बना ,
सौहार्द्र सौंप
चाहता हूँ दायित्व मुक्ति
यदि पा सकूँ !

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