Sunday, November 23, 2008

अंकुर

अंकुर
आभा (मुक्तिबोध साहित्य सरणी पाथाखेडा जिला बेतुल मध्यप्रदेश ) में प्रकाशित (फरवरी 1999)
गले बीज ' फूटे अंकुर
जल थल के अनुकूलन से
उर्वर धरती की गोद पाय
तरु लदे पात फल फूलन से।

उन्नीस सदी एकादस सन
की ज्येष्ठ पूर्णिमा थी आई
वैद्यनाथ का जन्म हुआ
प्राची में अरुणाई छाई
मिटीं रूढियां गुरु समाज की
वैषम्य द्वेष उन्मूलन से
गले बीज औ' फूटे अंकुर
जल थल के अनुकूलन से।

पावन दामन में पले बढ़े
शुभ्र सुघड़ जीवन पाया
शिक्षा दीक्षा ज्यों पूर्ण हुई
त्यों बौद्ध धर्म था अपनाया
अनुराग बढ़ा पायी निजात
मानवता के प्रतिकूलन से
गले बीज औ' फूटे अंकुर
जल थल के अनुकूलन से।

था मन गृहस्थ तन यायावर
साहित्यकार जीवन पाया
करुणा संपूरित मिला ह्रदय
जन गण वाणी को अपनाया
शाश्वत मूल्यों की धार बही
जीवन सरिता के कूलन से
गले बीज औ' फूटे अंकुर
जल थल के अनुकूलन से।

निष्पक्ष सरल लेखन अद्भुत
औ' संत कबीरी फक्कड़पन
परवर्ती बने निराला के
पाया वैसा ही अक्खडपन
विद्रोही स्वर साहस असीम
हर पल खेले वे शूलन से
गले बीज औ' फूटे अंकुर
जल थल के अनुकूलन से।

संवेदन गंध लुटाय चला
प्रतिबद्ध रहा जो हर पल में
सत्तासी की चिर आयु पाय
इक सदी मुखर नागार्जुन में
श्रृद्धा अर्पण शत-शत वंदन
भाव- अश्रु फल- फूलन से
गले बीज औ' फूटे अंकुर
जल थल के अनुकूलन से




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