Monday, December 1, 2008

धरा स्वर्ग कहलाये



धरा स्वर्ग कहलाये


पीड़ा तो जीवन अंतस का
रहीसदा
मानसका चिंतन
यदि ये उर क्रंदन बन जाए
तो ये धरा स्वर्ग कहलाये

पर पीड़ा अपनी हो पाये
परमारथकर जग सरसाये
अक्षि नीर मोती बन जाए
तो ये धरा स्वर्ग कहलाये।

रक्त पिपासा अघ अभिलाषा
पलती रही सदा जिस उर में
उसमें यदि करुणा भर जाए
तो ये धरा स्वर्ग कहलाये ।

पर पीड़ा भी बनकर संवेदन
मम पीड़ा
सा अंतस सरसाये
हर संवेदन उर में बस जाए
तो ये धरा स्वर्ग कहलाये


पीड़ा का आभाव खलता है
मानव में दानव पलता है
यदि मानव-मानवहो पाये
तो ये धरा स्वर्ग कहलाये ।

पीड़ा मस्तक चंदन हो पाये
तब मानव- मानव कहलाये
विद्वेष- मुक्त समता जाये
तो ये धरा स्वर्ग कहलाये ।

सबके हित औ'सबके सुखमें
यदि अपना जीवन रंग जाये
सारी जगती अपनी हो पाये
तो ये धरा स्वर्ग कहलाये

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