Monday, December 1, 2008
स्वातंत्र्य पर्व
स्वातंत्र्य पर्व
आभा (मुक्तिबोध साहित्य सरणी पाथाखेडा जिला बेतुल मध्यप्रदेश ) में प्रकाशित (अगस्त 1998)
निज स्वतंत्र राष्ट्र का हमने
स्वर्ण जयंती वर्ष मनाया ,
आह्वान है चिंतन करने का
हमने स्वातंत्र्य कैसे पाया।
क्या खोया क्या पाया हमने
अर्द्ध शताब्दी पूर्ण हुई , औ'
लेखाजोखा देखें यदि हम तो
पाएँगे हमसे कुछ चूक हुई ।
क्या मूल्य चुका पाये उनका
कुछजिनका हमें चुकाना था,
गलीं पीढियाँ थीं बस जिसके
हित उसको ही अपनाना था।
अर्पित करने को शीश धरा
पर , वीर जो आगे आए थे ,
प्राणों की आहुति दे-दे कर
उन गीत क्रांति के गाये थे।
माँ के सपूत ही लाज रखें
हम सबकी माँ बहनों की,
है जिनके अंतस में बसती
भारतमाँ की पावन झाँकी।
प्रत्यूष पर्व नक्षत्र बने जो
है उनकी ही पहचान रही,
जो देश धरा के लिए जिए
उन्हीं का जीवन रहा सही।
आओ हम गुण-गान करें
आजादी के दीवानों का,
तनमनधन अर्पित करने
वाले उन वीरजवानों का।
सन्यासी विद्रोह हुआ जो
वो भारतमाँ का था उद्धार,
वीर प्रसविनी वसुंधरा का
था अर्चन -वंदन -श्रृंगार।
देश- भक्ति का ज्वार उठा
था भारत के जनसागर में ,
जागरण हुआ नर-नारी में
ग्रामीण और हर नागर में।
चेतना लहर सब में दौड़ी
विद्रोहअग्नि थी फूट पड़ी,
अंत फिरंगी का करने को
भारतकी जनता टूट पड़ी।
वीर सपूत मंगल पाण्डेय ने
आजादी-बिगुल बजाया था ,
एकत्र हुए सब क्रांतिवीर औ'
स्वतंत्रतानल भड़काया था।
युद्ध पताका थाम हाथ में
की झाँसी ने अगुआई थी ,
मुक्ति-वाहिनी नाना की
जो रानीकी अनुयायीथी।
वीर शिरोमणि तात्या ने
कर में करवाल उठाई थी ,
सबने मिलकर एक साथ
अंग्रेजोंको धूल चटाई थी।
खेत रहे झाँसी हित पूरन
वीरांगना झलकारी बाई ,
राधा-भाऊ वीर गौस खां
औ'खुदाबख्श मोती बाई।
लड़े अंत तक रानीके संग
रघुनाथ कुँअर मुन्दरबाई,
जूही सागरसिंह कुँअर से
थे काशी और सुंदर बाई।
झाँसीने बलिदान दिया जो
भूल न कोई पाया था औ',
क्रांतिज्वाल फैली जन-गण
मेंभगवांध्वज लहराया था।
उन वीरों का नाम अमर है
जिनने था बलिदान दिया,
और उन्हीं का नाम अमर
जिन गोरों को झुका दिया।
भारत के जन जन ने फिर
से वंदे मातरम गाया था ,
स्वतंत्रता अधिकार हमारा
नारा तिलक लगाया था।
महर्षि दयानंद से सन्यासी
स्वातंत्र्य यज्ञ में कूद पड़े ,
औ'यती विवेकानंद सरीखे
पूर्णाहुति को निकल पड़े।
गोखले वीर सावरकर से थे
अरविन्द घोष वारींद्र घोष ,
अनुयायी शतशत क्रांतिवीर
सरदार भगत औ'खुदीबोस।
गाँधी सुभाष असफाक सभी
जन बिस्मिल बटुकेश्वर जैसे,
थे राजगुरु मन्मथ से नायक
अरु आज़ाद चन्द्रशेखर तैसे।
लालपाल से अनुयायीथे
बाल तिलक गंगाधर के,
जिधर चले योद्धा अनेक
थेसुखदेव ऊधमसिंह से।
जागरण मंच देते युग को
कुछ ऐसे प्रखर मेधावी थे,
सक्रिय मनीषी मालवीय
विद्यार्थी बहुत प्रभावीथे।
बालकृष्ण शर्मा नवीन की
कलम उगलती आग सदा,
अज्ञेय नाम युगक्रांति रहा
कला क्रांति से नहीं जुदा ।
नेहरू पटेल बाबा साहेब
औ' देशबंधु से लायर थे,
जो राष्ट्रदीपके शलभ बने
वे माखन जैसे शायर थे।
कुछ तो भारत माँ के सपूत
जो रचते थे इतिहास नया,
स्वतंत्रता है जिनकी काशी
औ'काबा मथुरा बोध गया।
सर्वस्व लुटाया देश धरा पर
था जिनका स्वर्णिम सपना,
पायेगा स्वातंत्र्य विभा जब
बलिदान फलेगा तब अपना।
क्या साध पूर्ण कर पाये हम
उनकी जो थे बलिदानी वीर
किया कलंकित है उनको ही
जो रहे विवेकी नीर -क्षीर ।
यद्यपि खोजे हैं विविध क्षेत्र
उन्नति के मिल कर हमने ,
है विज्ञान तकनीकी में भी
पायी सफलता हम सबने ।
आत्मनिर्भरता अनाजकी
पायी,अन्तरिक्ष पहचाना,
कर्षण यंत्रों के साथ साथ
परमाणु अस्त्र संधाना ।
हुए नये अन्वेषण जग में
पीछे नहीं किसी से हम ,
पर पिछड़ गए शिक्षा में
जिसका है हमको गम ।
कहीं कहीं पर बढ़ी भुखमरी
कहिं घोर गरीबी का आलम,
राष्ट्रचरित का हनन कहीं औ'
कहिं सम्प्रदायवाद-मातम।
कहीं बढ़ा उन्माद धर्म का
द्वेष- भाव जिससे बढ़ता ,
भाषावाद व क्षेत्रवाद का
ज़हर सदा रहता चढ़ता ।
मुक्ति पा सकें यदि इनसे
तो राष्ट्र हमारा सोना है ,
विकासशील से विकसित
होंअन्यथा हमेशा रोना है।
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1 comment:
आपका लेख पढ़कर हम और अन्य ब्लॉगर्स बार-बार तारीफ़ करना चाहेंगे पर ये वर्ड वेरिफिकेशन (Word Verification) बीच में दीवार बन जाता है.
आप यदि इसे कृपा करके हटा दें, तो हमारे लिए आपकी तारीफ़ करना आसान हो जायेगा.
इसके लिए आप अपने ब्लॉग के डैशबोर्ड (dashboard) में जाएँ, फ़िर settings, फ़िर comments, फ़िर { Show word verification for comments? } नीचे से तीसरा प्रश्न है ,
उसमें 'yes' पर tick है, उसे आप 'no' कर दें और नीचे का लाल बटन 'save settings' क्लिक कर दें. बस काम हो गया.
आप भी न, एकदम्मे स्मार्ट हो.
और भी खेल-तमाशे सीखें सिर्फ़ 'ब्लॉग्स पण्डित' पर.
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